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        उन्नयन के लिए सही समय

    थॉमस रॉबर्ट माल्थस, अंग्रेजी मूल के जनसांख्यिकीविद् और अर्थशास्त्री, जो 18 वीं और 19 वीं शताब्दी में रहे, ने अपने प्रसिद्ध सिद्धांत को सिद्ध करके इतिहास में अपना स्थान दर्ज किया कि जहां अंकगणितीय प्रगति में खाद्य आपूर्ति बढ़ती है, वहीं ज्यामितीय प्रगति में जनसंख्या आगे बढ़ती है। उनके सिद्धांत का सार यह है कि जब तक जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए कदम नहीं उठाए जाते, जल्द ही ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाएगी कि इस भूमि पर रहने वाले लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं होगा। माल्थस ने यह भविष्यवाणी 18वीं सदी के अंत से कुछ साल पहले की थी जब दुनिया की आबादी एक अरब के दायरे में थी। हालांकि, अगली दो शताब्दियों के दौरान दुनिया की आबादी में सात गुना से अधिक की वृद्धि हुई है, लेकिन माल्थस की भविष्यवाणी की गई खाद्यान्न की कमी नहीं हुई।

    प्रौद्योगिकी के विकास से माल्थस गलत साबित हुआ जिससे उस समय की आबादी की मांगों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न का उत्पादन करने में मदद मिला। इस प्रकार खाद्य उत्पादन जनसंख्या में वृद्धि के साथ गति को बनाए रखने में सक्षम था क्योंकि केवल नई किस्मों के बीज, अधिक शक्तिशाली उर्वरक, खेती के मशीनीकरण और खाद्यान्न के परिवहन और भंडारण के लिए बेहतर तरीके का विकास आदि सहित बेहतर कृषि तकनीक से संभव हुआ। खाद्य उत्पादन चक्र के सभी क्षेत्रों में नई और आधुनिक तकनीक के विकास और प्रयोग से किसानों को भी मदद मिली क्योंकि वे अपनी उपज का बेहतर मूल्य प्राप्त करने में सक्षम थे, जिससे उन्हें खेती में अधिक समय, प्रयास और संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया गया। यह वैज्ञानिकों और कृषकों का संयुक्त प्रयास था कि,  वैज्ञानिकों ने नई खोजें की और विधियों को विकसित किया, और किसानों ने उन्हें प्रयुक्त किया, जिससे माल्थस की धारणाओं को खारिज करने में मदद की।

    प्राकृतिक रबड़ क्षेत्र को भी ऊपर दिए गए उदाहरण से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालना चाहिए क्योंकि यह इस क्षेत्र पर भी लागू होता है। परंपरागत रूप से वैज्ञानिकों द्वारा विकसित और किसानों द्वारा प्रयुक्त तरीके निस्संदेह बहुत अच्छे रहे हैं। लेकिन एक समय आता है जब उत्पादन उच्च सीमा पहूँचता है एक उन्नयन के बारे में सोचने का संकेत होता है। प्राकृतिक रबड़ की खेती में, बीज संग्रह से लेकर  लेटेक्स से शीट रबड़ बनाने के प्रसंस्करण तक कृषक लाभान्वित हुए है, लेकिन हाल में, आय में तेजी से कमी हो रही है। यह पहला संकेत है कि उत्पादकता में सुधार, उत्पादन लागत को कम करने, इस प्रकार किसान के व्यक्तिगत आय में वृद्धि करने के लिए प्राकृतिक रबड़ मूल्य श्रृंखला के सभी खंडों को उन्नत करने का समय आ गया है।

    रबड़ बोर्ड द्वारा हाल में शुरू किए गए उपाय उत्पादकता बढ़ाने और उत्पादन लागत को कम करने के दोहरे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अभिहित किया गया है। आनुवंशिक रूप से संशोधित पौधे का विकास और इसका उपयोग करके क्षेत्र परीक्षण शुरू करना इस दिशा में एक और कदम है। यदि मैंगनीज सुपरऑक्साइड डिसम्यूटेज जीन के साथ प्ररोपित यह पौधा सफल हो जाता है, तो एक नाटकीय परिवर्तन के अग्रदूत के रूप में कार्य करेगा, जिससे रबड़ के पेड़ जलवायु की चरम सीमाओं के कारण होने वाले तनावों के लिए प्रतिरोधी बन जाएंगे। यह उस युग में अत्यंत महत्वपूर्ण होगा जब मौसम और जलवायु पैटर्न में परिवर्तन न केवल किसानों के लिए बल्कि पूरी आबादी के लिए भी एक चुनौती बनकर खडा है।

    रबड़ बोर्ड के अधीन भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान (RRII) ने रबड़ के पूरे जीनोम अनुक्रम को सफलतापूर्वक डिकोड किया है। यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है क्योंकि यह जानकारी इस प्रजाति में उपज की सीमाओं को तोड़ने में मदद करेगी और बीमारियों के प्रति बेहतर सहनशीलता के साथ जलवायु-लचीला स्मार्ट क्लोन विकसित करने में भी मदद करेगी और क्षेत्रीय अनुकूलन क्षमता में तेजी से और अधिक कुशलता से सुधार करेगी।

    मैं रबड़ बोर्ड के सेवारत और सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों को बधाई देता हूं, जिनके अथक प्रयासों से यह उपलब्धि संभव हुई।

    सस्नेह,

    डॉ. के.एन. राघवन,

    अध्यक्ष एवं कार्यकारी निदेशक,

    रबड़ बोर्ड

     

     

     

     

    भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान (रबड़ रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया - आर आर आई आई)1955 में स्थापित किया गया था। संस्थान ने अपने अनुसंधान योगदान के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय रबड़ परिदृश्य में एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त किया है। भारतीय रबड़ अनुसंधान स्स्थान इंटरनेशनल रबड़ रिसर्च एंड डेवलपमेंट बोर्ड का सदस्य है और कई अंतर्राष्ट्रीय शोध कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भाग लेता है। भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान ने भारत में उच्च उत्पादकता प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    स्थान

    भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान का मुख्यालय केरल राज्य में कोट्टयम शहर से 8 किमी पूर्व में एक पहाड़ी पर स्थित है, जिसमें एक अनुसंधान प्रक्षेत्र जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा नेडुंबाश्शेरी, कोची में है, जो 100 किमी उत्तर में है।

    संस्थान का केंद्रीय परीक्षण स्टेशन कोट्टयम से 50 किमी दूर चेत्तक्कल (रान्नी) में स्थित है। स्थान विशिष्ट शोध चलाने के लिए, संस्थान ने उत्तर पूर्व भारत के लिए अगर्तला में मुख्यालय के साथ एक अनुसंधान परिसर स्थापित किया है और त्रिपुरा में अगर्तला, असम में गुवाहाटी और मेघालय के तुरा में क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र हैं। भारतीय रबड़ अनुसंधान संस्थान ने दपचरी (महाराष्ट्र), कामाख्यायनगर (उड़ीसा), नागराकट्टा (पश्चिम बंगाल), परलियार (तमिलनाडु), नेट्टणा (कर्नाटक) और पडियूर (केरल) में क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र स्थापित किए हैं। मृदा और पत्ती परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना कोट्टयम, त्रिपुरा, तलिपरम्बा, कोष़िकोड, तृश्शूर, मुवाट्टुपुष़ा, पाला, कांजिरपल्ली, अडूर और नेडुमंगाड में की गई है। मृदा और पत्ती विश्लेषण के लिए मोबाइल इकाइयाँ मुख्यालय, त्रिपुरा, कोष़िकोड, मुवाट्टुपुष़ा और अडूर में उपलब्ध हैं।

      अधिक ...

    https://training.rubberboard.org.inhttp://indiannaturalrubber.com/

    आयोजन

    पर भारतीय मूल्य 21-09-2021 per 100Kg

    वर्ग रुपयेडॉलर
     RSS4 17200.0 233.75
     RSS5 16900.0 229.65
     ISNR20 16400.0 222.85
     Latex(60%) 12365.0 168.00
    वर्ग रुपयेडॉलर
     RSS4 17200.0 233.75
     RSS5 16900.0 229.65

    ** The prices shown above do not include GST @ 5% on purchase and expenses towards transportation, warehousing and other incidentals.

    *(price not available). #(Market Holiday). ~(No Transaction).

    पर अंतरराष्ट्रीय मूल्य 21-09-2021 per 100Kg

    वर्ग रुपयेडॉलर
     SMR20 11805.0 160.30
     LATEX(60%) 8787.0 119.30
    वर्ग रुपयेडॉलर
     RSS1 12991.0 176.40
     RSS2 12858.0 174.60
     RSS3 12737.0 172.95
     RSS4 12671.0 172.05
     RSS5 12571.0 170.70

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    Last reviewed and updated on 21-Sep-2021